Wednesday, November 6, 2013

“सद्भावना”



मित्र !
खोजने चलोगे क्या तुम
मेरे साथ
एक शब्द नया
सद्भावना के लिए
अर्थ यदि शेष अवशेष की तरह
बच रहे हों कहीं
उस शब्द के अर्थ की
आकृति
बहुत कुछ खण्डित है
धूल भी पर्त दर पर्त चढ़ी है बहुत
तलाशेंगे भी कहाँ निश्चित नहीं अभी
लेकिन चलते हैं, निकलते हैं
कदम पहला जिधर पड़ेगा दिशा वही बनेगी
और फ़िर
पहले ही बढ़े पग पर भी तो खॊजना होगा
अनुभवों की काई में
शास्त्र की अंगड़ाई में
युक्ति की चतुराई में
कानून की अकड़ाई में
सम्बन्धों की कड़वाई में
विश्वासों की खटाई में
वासना की परछाईं में
या
प्रेम-घृणा की सच्चिआई में
फ़िर भी लगे मुश्किल तो
जंगल की उलझी कंटीली झाड़ियों से
पकड़ लेना सुनहरी पंखों वाली
तितली
और तुम विश्वस्त हो के
लौट आना वापिस बिना झिझक
और कह देना
तुम्हें सब पता है
सब जानते औ’ समझते हो?

मित्र !

No comments: